सत्यमेव जयते नानृतम्
प्रथम वक्तव्य
हंसो के प्यारे भक्तों के जीवन सर्वस्व सत्य साकेत लोकवासी परब्रह्म परमात्मा पुरुषोत्तम, श्री सत्यपुरुष की अहेतु की दया, अखिल ब्रह्माण्डो के सभी जीवों पर सदा बनी रहती हैं |
यद्यपि जीव क्षण २ में ओर का ओर होनेवाले असार भवसागर के चंचलं तरंगो के प्रबल वेग से इतस्ततः बहता हुमा, माया के गहरे भंवर में फसकर, पुत्र दार गृहादि के झूठे अभिनिवेश से तेरा मेरा करता हुआ सच्चे स्वामीको भुला, झूठे मोहों में मुग्ध हो जाता है पर वो खच्चा प्रेमी अपने अनूकम्प्यों का कभी विस्मरण नहीं करता प्रतिक्षण इन्हीं चिन्ता में है फिर उन भक्तोंकी तो बात ही दूसरी है जौ सारे विश्वको उसीकी चरण रेणु के एक कण पर न कुछकी तरह निछावर किये बैठे हैं ।
स्वगे, नरक, उच्च, नीच, पौर्वात्य, पाश्चात्य, हिन्दू , अहिन्दू सर्वत्र उसका सहज प्रकाश सदा पहुचा करता है । यादृश्य कर्मफलोंको भोगने के लिये जैसे साधनोंकी आवश्यकता होती है वो बिना किसी प्रार्थना के अपने ही आप वैसे ही साधन दे देता है जिनसे कि, प्रारब्ध भोगोंको भोगने में समर्थ होसके । जो जिस देशका रहनेवाला है उसे उसी देशके अकंटक निर्वाह करनेके सब उपकरण प्रदान कर दिये हैं । शीत देशके जन्मे हुओंको वहाँ के अनुकूल तथा गर्म देशोंकि रहनेवालोंको गरम सह सकनेके योग्य बनाया है।
यह ईश्वर की सहज दयाका ही फल हैं । उसीकी दी हई शक्तिसे सब शक्तिवान् बन रहे हैं । जिसमें जो स्वाभाविक्ता दीखती है सब उसीकी दी हई है; इसीसे यह अनुमान, सहज ही में लगाया जा सकता है कि, सब पर उसकी अहेतुकी दया है सबका वो सच्चा प्यारा हैं उसका किसीसे द्वेष नहीं है। वो किसे भूले तथा द्वेष भी किससे करे उसीके लोकका प्रकाश जो चैतन्याकाश पर पड़ा वही तो समष्टि जीव है उससे इतर थोड़ाही है यही सादिबसे विमुखं होकर संसारी बना है पर साहिब इससे कभी भी विमुख नहीं होता जो कि इसे भूल जाय ।
इसीने देव देवी बनकर देव लोक, नाग नागिनि होकर पाताललोक, किन्नर किन्नरी बन कर किन्नर लोक, यक्ष यक्षिणी बनकर यक्षलोक वम् मानुष एमानुषी बनकर मनुष्य लोक भर दिया है। मनुष्यो में भी कोई राजा कोई प्रजा कोई धनी, निर्धन, कोई निर्बल सबल, कोई पुज्य, अपूज्य एवं कोई ज्ञानी तथा कोई अज्ञानके घोर तममें पड़ा ठोकरें खा रहा है।
जो जो जीवोंका स्वभाव बन्धनोंमें बँधनोंक होता जाता है त्यों २ वो अपनी तरह खींचनेके लिये हाथ बढाता जाता है। जीव मार्ग भूल कर गङ्ढोंकी ओर भगे जा रहे हैं तो वो उन्हैं मार्गपर लानेका प्रयत्न कर रहा है। |
संसारी व्यवहारोंको अच्छी तरह जत्तानेके लिये, इसके व्यवहारोंका सुखपुर्वक पालन करनेके लिय एवम् बिना किसीके सताये आनन्द पूर्वक रहते हए आगे बढ़नेके लिये, अपरा विद्याका उपदेश दिया जिसे कि कोई २ पुरुष वेद कह कर भी बोलते हैं । जो भवके परितापोंसे छूटना चाहते हैं जिन्हे कि, इन्द्रकी वो सुधर्मा सभा जहाँ कि सदा उर्वशी जसी लोकोत्तर सुन्दरियोंके नाच रंग हुआ करते हैं , कोई अनुराग न पैदा करे कितु दुःखका ही साधन प्रतीत हो एसे पुरुषोंके लिये परा विद्याका उपदेश दिया जिसे कि, स्वसंवेद भी करते हैं । निरंजनके राज्यके अनन्त ब्रह्माण्ड हैं एक एकमें अनन्त अनन्त लोक हु प्रत्येक लोकमे अनन्तोंही हैं एक ही यह भूमण्डल सत्त महा-दीपोंमे विभक्त हो रहा है एक ही जम्बूद्रीपमें भीतर एशिया आदि कई महाद्वीप संभाले जा रहे हैं । सृष्टिक पुरुषोंको ज्ञानोपदेश करनेका मार्ग एशियाका भारत वर्ष ही रहा है, सत्य पुरुषके दिव्य सन्देश इसी पुण्यभूमिमें आये एवं यहींसे विश्वके मानव समाजको हितोपदेश भिला है । सूष्टिके आदिमें ऋषि महषियोंके द्वारा वेदके दिव्य प्रकाशसे संसार भरको सन्मार्ग दिवाया गया जो कि, महाभारतके समयसे पूर्व तक अक्षुण्ण बना रहा । द्वापरके अन्तमें श्रीकृष्ण द्वेपायनने उसे पुन: परिष्कृत कर दिया ।
यद्यपि धर्मराज युधिष्ठिरजीके वंशधर उनके सत्यधाम पधारनेपर बीस पीढी पतक एक छत्र शासन करते रहे हैं कितु जनमेजयके शासनके वाद उनका शासन सूत्र ढीला होने लग गया था इस बातकी साक्षी भारतका इतिहास दे रहा है। ऋषि मुनियोंको प्यारी तपोभूमि इस भारत वर्षमें अनेक तरहके मनमाने मत फल गये थे । मनमाने देवता कल्पित करके उनके नाम पर मनमाने कार्य किये जा रहे थे, मद्यपलोग मधके सकडोंकों समुद्रोंको सोख डालनेवाले रौख मद्यप देवताओंकी कल्पना करके गूलरकेसे रंगकी मद्यको बोततलोंपर बोतलें उड़ा रहे थे । निष्करुण मांसप्रिय मनुष्योंने सांसका बाजार गरम कर रखा था । परस्त्रीगामियोंने अपनी विचित्र आराधनाके नामपर रजकियों ओर चाण्डालिनीतकों को अपनी सिद्धिका साधन प्रसिद्ध किया था।
एसे अत्याचारियोके नग्न अत्याचारोंसे सत्य पुरुषके सच्चे भक्त सताये जा रहे थे, उसकी दिव्य सन्देशमयी परा अपरा दोनों वाणियोंका मूलोच्छेद हो रहा था, उनके प्रेमी पुराने लकीरके फकीर कहकर घृणाके गड्ढ़ेके नीचे दबाये जा रहे थे, इनकी दर्द भरी आवाज सत्यपुरूषके कान पड़ी उसका हदय स्वाभाविकी दयासे एकदम द्रवीभूत हुआ । क्योकि वो सत्यपुरुष असावधान नहीं था सत्य मागेके खोजनेवालोंको उस समय भी वो अपना मार्ग बता देना चाहता था उसके भेजे हुए पथ प्रवर्तक भी उसका पूरा आचरण करके दिखा देना चाहते थे कि, इस प्रकार चलने पर अब भी सत्यलोक दूर नहीं है । ये सत्य पृरुषके सत्यलोकके आये हुए पक्के तत्तवके देहवाले उसीके हंस ये, यदि ये केवल उपदेशकाही कार्य्य रखते तो कलियुगकी कलुषिप्त भावनाओंको अपने ओजस्वी वचनोंसे निःशेष कर डालते । पर पर्वतोकी कन्दराओंमें प्राचीन वृक्षोंकी खोढ़रोंमें पवित्र वनों एवम् एकान्तके पुण्य स्थलोंमें सत्यलोकोंके हंसोंके कृत्य कर २ कर दिखा रहे थे ।
जिन्होने इनके लोकोत्तर चरित्रको जान पाया, जिन्होंने उनके जीवन चरित्रोंपर दृष्टि डाल कर उन्हें अपना आदर्श बनाया वे अधिकारी मुक्तिपथको अधिकृत करके इस असारसे बन्धनोंको तिनकेकी तरह तोड़कर साकेत लोक चले गये पर जिन्होंने उन्हें नहीं समझ पाया ऐसे पुरूषोंको उनसे कोई लाभ नहीं पहुँचा । जिन्हें उनसे लाभ पहुँचा एसे जीवोंकी संख्या उंगलियो पर गिनी जा सकती थी । ।
उस समय उनका इतना अधिक प्रचार नहीं हआ कि, सर्व साधारण उनसे लाभ उठा सकें । यह देख जगदीशने अधिकारी बना २ कर उसीके अनुसार उपदेश देना प्रारंभ किया ।
भगवान् बुद्ध देवने महावीर स्वामीको साथ लेकर अहिंसाके उच्च सिद्धान्तके जय घोषसे भूमण्डलको व्याप्त कर दिया । विक्रमार्कने वेदिक विकासको निष्कंटक बना दिया, श्रीशङकरस्वामीने पूर्वमीमांसाआदिकी प्रतिद्वन्दिता में उत्तर मीमांसा स्थापित्त की, श्रीरामानुजाचार्य , निम्बादित्य अदि दिव्य आचार्य्य पुरुषोने जीव, ब्रह्म ओर माया विषयक विज्ञानोंको सर्व सधारणोंके सामने रखा ।
किन्तु महाराजा अशोक के वंशधरों को निर्बल हो जानेके पीठे भारतका वैदेशिक प्रचार शिथिलप्राय होगया क्रमषः दूसरे देश भारतके दावेसे निकल गये ।
इतिहास एवम् पुरातत्व की खोज तो हमें यह बत्ताती है कि, महाराजा अशोकका इतना बड़ा साम्राज्य था जित्तना कि अशोकके बादकी कोई भी शक्ति आजतक नहीं बनासकी है न बनानेकी आशाही है। आजकी बौद्धोंकी ६३ करोड़ोकी संख्या भगवान् बुद्ध देवके सार्वजनीन हितोपदेशके बदलेकी है इसका निर्माण सच्चे उपदेशके आधार परही हआ है यह कहीं भी लिखा हुआ नहीं मिलता कि बौद्धोंने कभी भारतसे बाहर विदेशोंमें तलवारके बलपर बौद्ध धर्मका प्रचार किया था जैसे कि इसलामके पर्वतकों ने धर्मभ्रचारके नामपर असहाय जीवोंका रक्त पानीसे भी सस्ता बहाया है। बौद्ध धर्मका सच्चा सिद्धान्तं अहिंसा था जिसका कि प्रचार केवल विश्वके निरीह प्राणियोंको शान्ति देनेके लिये किया गया था। यही भारतके वीरों की विशेषता है कि, यहाँ के धर्म प्रचार भी सुख शान्ति पूर्वक एवं सुख शांतिके लिये हुए । उनका यह सिद्धान्त कभी भी नहीं हुआ कि , परमात्माने हम राजाओंको इसलिथे पैदा किया है कि हमारे मजहबके न माननवालों काफिरोंको कत्ल कर दिया करे एवम् धर्माचार्योंको को धर्मभ्रचारके लिय भेजा है ।
किन्तु उनका तो यही विचार रहा है कि, हमे परमात्माने प्रजाका रंजन करनेके लिये भेजा है कि, उसे किसी तरह भी दुखी न होने दे तथा भारतके धर्माचार्य दिव्य सन्देश सुनानेके लिये आते है सत्यपुरुषका सामयिक अनुशासन जनताके सामने रख देनेका उनका कार्य है यह लोगोंकी इच्छापर निर्भर रहा दहै कि माने वा न माने, न तो इस विषयमें उन्होंने कभी बल प्रयोगको उत्तम समझा न कमी ऐसीं आज्ञाही दी है।
जब मैं सांप्रदायिकताके संकीर्ण दायरेकी ओर जाता हुँ तो मुझे यह कहनेके लिये अवश्य बाघ्य होना पड़ता है कि, संकीर्णता तो किसीकी भी सर्वाशतः सच्ची नहीं कही जा सक्ती चाहे वो अपने संप्रदायकी हो चाहे दूसरोंकी हो पर पश्चिमके धर्माचार्योंके हृदयमें चाहे कुछ भी हौ कुछ एकको छोड़कर अपन सिद्धांतों के प्रचारमें हिंसाका आश्रय सबने लिया है यही पूर्व ओर पश्चिमकी विभिन्नता है।
उनका तलवारके बलका धर्म प्रचार उन्हींके देशोंमें नियमित रहा हो यह बात नहीं है किन्तु उनके अनुयायियोंने मानव सत्यताको सिखानेवाले सब धर्मोकि गुर एवम् आपसकी फूटसे स्वतः विदीर्ण हए शिथिलेन्द्रिय इस वृद्ध भारतवर्ष को भी धर्मके नामपर रक्त रंजित किये बिना नहीं छोड़ा । भारतवर्षकी सीमाके देशोंके बलपूर्वंक इसलाममें दीक्षितकर लेनेके पीछे भारतवर्षकी बारी आई, सम्राट पृथ्वीराजके बाद भारतवर्ष मसलमानोंके ताबे आया।
मुसलमान शासंकोने धर्म के नामपर बड़े २ अत्याचार किये प्रतिदिन बेगुनाहोंका रक्त पानीकी तरह बहाया जाता था हिन्दू धर्म ग्रन्थोंसे पानी गरम हुआ करते थे, हजारों कृलललनाएँ वेश्याओंसे भी बुरी बना २ कर बिठा दी जाती थी विशेष क्या कहा जाय यदि उस कालमें रौरव नरक भी मूर्तिमान् होकर भारतकी दुर्दशा देख लेता तो वह भौ इसकी दशापर दो चार आसू बहाये बिना न रहता । देशभरमें त्राहि २ मची हुई थी जिनके हाथमें शासन सूत्र था वे अपना विशुद्ध कर्तव्य भुलाकर धर्म द्वेषमे फँसकर पैशाचिक अत्याचार कर रह थे । अन्तमे निर्दोषोंका खन रंग लाया, सत्यषुरुषका हृदय असहाय दुःखी भारतवासियों की करुणा से पूर्णं हो गया जले हृदयोंकी उन्होंने निरेजनके शरीरसे भी अगाडी निकलकर सत्यलोकका द्वार जा खट खटाया।
कबीर साहिबको आज्ञा :- हुई कि, आप पुण्य भूमि भारतमें जाकर दुःखी जीवोंको दुःखसे मुक्त करो सच्चे सामान्य धर्मका उपदेश करो जो सबका एकसा है । हिन्द मुसलमान दोनोंको उसके प्रकाशसे प्रकाशित कर दो जो कि, वे आपसके कलहको छोडकर सच्ची शांतिको ग्रहण करलें । सभी कबीर साहेबके विषयमें मुक्त कण्ठसे स्वीकार करते है कि, कबीर साहिबका सामान्य धर्मका उपदेश था जो कि, सभी धर्मवालोंको एकसाही हितकारी है, उनकी युक्तियाँ भी सर्व धर्म विषयिणी थी |